सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से पूछा, शैक्षणिक संस्थानों में suicide रोकने के लिए क्या किया, 8 सप्ताह में बतावें
सुप्रीम कोर्ट जनवरी 26 में करेगा प्रकरण में आगे की सुनवाई

देश के शैक्षणिक संस्थानों के छात्रों के suicide करने की बढ़ती घटनाओं को लेकर गंभीर सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी राज्यों को आठ सप्ताह में हलफनामा दाखिल करके बताने का निर्देश दिया है कि शैक्षणिक संस्थाओं में suicide की घटनाओं को रोकने के लिए उसने क्या कदम उठाये हैं. सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने राज्यों के अलावा केन्द्र शासित प्रदेशों से भी इस पर रिपोर्ट मांगी है. सुप्रीम कोर्ट की बेंच इस प्रकरण में अगली सुनवाई जनवरी 2026 में करेगी.
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 25 जुलाई को सुनवाई के बाद दिये गये अपने फैसले में शैक्षणिक संस्थानों में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के निराकरण के साथ sucide की घटनाएं रोकने के लिए दिशा निर्देश दिये थे. कोर्ट अपने फैसले में निर्धारित दिशानिर्देशों के अनुपालन से संबंधित एक मामले की सुनवाई कर रही थी.
25 जुलाई के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश जहाँ तक संभव हो सभी निजी कोचिंग केंद्रों के लिए पंजीकरण छात्र सुरक्षा मानदंड और शिकायत निवारण तंत्र को अनिवार्य बनाने वाले नियमों को दो महीने के भीतर अधिसूचित करे.
सुनवाई के दौरान बेंच को बताया गया कि जुलाई के फैसले में केंद्र को 90 दिनों के भीतर अदालत के समक्ष एक अनुपालन हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया था. सोमवार को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस फैक्ट को भी एड किया कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस मामले में प्रतिवादी बनाया जाए. वे आठ सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल कर सकते हैं.

कोर्ट ने शैक्षणिक संस्थानों में आत्महत्याओं (suicide) में वृद्धि को ध्यान में रखते हुए छात्रों को प्रभावित करने वाले मानसिक स्वास्थ्य संकट की गंभीरता को संबोधित करने पर जोर दिया और इससे निपटने के लिए अखिल भारतीय दिशानिर्देश जारी किए. कोर्ट पहले ही कह चुकी है कि शैक्षणिक संस्थानों कोचिंग केंद्रों और छात्र-केंद्रित वातावरण में छात्रों की आत्महत्या (suicide) रोकथाम के लिए एक एकीकृत लागू करने योग्य ढाँचे के संबंध में देश में विधायी और नियामक शून्यता बनी हुई है.
25 जुलाई को दिये गये फैसले में 15 दिशानिर्देश जारी करते हुए बेंच ने कहा था कि ये तब तक लागू रहेंगे और बाध्यकारी रहेंगे जब तक कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा उपयुक्त कानून या नियामक ढाँचा लागू नहीं कर दिया जाता. कोर्ट ने कहा था कि सभी शैक्षणिक संस्थान उम्मीद मसौदा दिशानिर्देशों, मनोदर्पण पहल और राष्ट्रीय आत्महत्या (suicide) रोकथाम रणनीति से प्रेरणा लेते हुए एक समान मानसिक स्वास्थ्य नीति अपनाएँगे और उसे लागू करेंगे.
पीठ ने कहा था “इस नीति की वार्षिक समीक्षा की जायेगी ताकि इसे अपडेट करके संस्थानों की वेबसाइटों और सूचना पट्टों पर उपलब्ध कराया जाए. कहा था कि केंद्र ने अब तक स्थिति को नियंत्रित करने और सुधारने के लिए कई निवारक कदम उठाए हैं और स्कूल स्तर पर, छात्र आत्महत्या की रोकथाम के लिए उम्मीद (समझना, प्रेरित करना, प्रबंधन करना, सहानुभूति देना, सशक्त बनाना और विकसित करना) मसौदा दिशानिर्देश शिक्षा मंत्रालय द्वारा 2023 में जारी किए गए थे.
आत्महत्या (suicide) रोकथाम के लिए एक एकीकृत लागू करने योग्य ढाँचे के संबंध में देश में विधायी और नियामक शून्यता
इसने उल्लेख किया था कि व्यापक पहुँच के लिए शिक्षा मंत्रालय ने कोविड-19 महामारी और उसके बाद छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण के लिए ‘मनोदर्पण’ कार्यक्रम शुरू किया था. 25 जुलाई का फैसला आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के एक आदेश के खिलाफ अपील पर आया था जिसमें विशाखापत्तनम में तैयारी कर रहे 17 वर्षीय राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा के अभ्यर्थी की अप्राकृतिक मृत्यु की जाँच सीबीआई को सौंपने की याचिका खारिज कर दी गई थी.