अपने बचाव में साक्ष्य एकत्र करने (351 BNSS) के लिए Bail की मांग करना, जमानत पाने का मजबूत आधार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि अपने बचाव में साक्ष्य एकत्र करने और इसकी तैयारी के लिए Bail पर रिहाई की मांग करना, Bail पाने का मजबूत आधार हो सकता है. अभियोजन साक्ष्य के बाद Bail मिलने से अभियुक्त अपनी बेगुनाही साबित करने के साक्ष्य एकत्र कर सकेगा. यह आदेश जस्टिस अजय भनोट ने आशा व विकास कंजड़ सहित दर्जनों अन्य की ज़मानत अर्जियों पर एक साथ सुनवाई करते हुए दिया है.
याचियों का कहना था कि अभियोजन का साक्ष्य पूरा हो चुका है या पूरा होने वाला है. इसके बाद बचाव पक्ष के साक्ष्य लिए जाने हैं. इसलिए बचाव में साक्ष्य जुटाने के लिए Bail पर रिहा किया जाना चाहिए. कोर्ट के समक्ष विचारणीय प्रश्न था कि क्या बचाव के लिए साक्ष्य जुटाना और प्रभावी रूप से बचाव की तैयारी करना Bail मांगने का आधार हो सकता है और यदि ऐसा हो सकता है तो उसके क्या मानक होने चाहिए.
कहा गया कि संविधान का अनुच्छेद 21 गरिमामय जीवन का अधिकार अभियुक्त को Bail पाने का अधिकार देता है. यह भी कहा कि Bail से इंकार करने से अभियुक्त अपना बचाव सही तरीके से नहीं कर सकेगा और उचित न्याय नहीं होगा. राज्य सरकार का कहना था कि बचाव के लिए Bail मांगना जमानत का आधार नहीं हो सकता. जमानत देते समय पीड़ित और अभियोजन के परिप्रेक्ष्य पर भी विचार करना होगा.
कोर्ट ने कहा कि अभियोजन का साक्ष्य पूर्ण होने के बाद सीआरपीसी की धारा 313 (351 बीएनएस) के तहत अभियुक्त को बचाव करने और साक्ष्य प्रस्तुत करने का मौका दिया जाता है. अभियुक्त को बचाव के लिए जमानत दिए जाने पर विचार करने का यही उचित समय है. कोर्ट ने कहा कि अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए बचाव के साक्ष्य तैयार करना और उसे प्रस्तुत करना अपराधिक विचारण प्रक्रिया में केवल औपचारिकता नहीं बल्कि स्वच्छ और पारदर्शी न्याय प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है.
अभियोजन साक्ष्य पूरा होने के बाद Bail मांगने वाले अभियुक्त द्वारा गवाहों को प्रभावित करने या साक्ष्य से छेड़छाड़ करने की गुंजाइश खत्म हो जाती है.
इस स्तर पर Bail दिए जाते समय कई पहलुओं पर विचार किया जा सकता है. अभियोजन साक्ष्य पूरा होने के बाद अभियुक्त द्वारा गवाहों को प्रभावित करने या साक्ष्य से छेड़छाड़ करने की गुंजाइश खत्म हो जाती है. इसके अलावा अपराध की गंभीरता व समाज पर इससे पड़ने वाले प्रभाव आदि पर भी विचार किया जाना चाहिए. कोर्ट अपराध के तथ्यों और परिस्थितियों के अनुसार जमानत देते समय अभियुक्त पर अतिरिक्त शर्तें भी लगा सकती है.
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