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सेक्शन 304-B IPC सिर्फ अंदाजा लगाता है और यह तय करता है कि कम से कम Punishment सात साल होनी चाहिए, उम्र कैद की सजा हर मामले में नहीं दी जा सकती: HC

सेक्शन 304-B IPC सिर्फ अंदाजा लगाता है और यह तय करता है कि कम से कम Punishment सात साल होनी चाहिए, उम्र कैद की सजा हर मामले में नहीं दी जा सकती: HC

सेक्शन 304-B IPC सिर्फ अंदाजा लगाता है और यह तय करता है कि कम से कम Punishment सात साल होनी चाहिए, लेकिन Punishment उम्रकैद तक बढ़ाया जा सकता है. इसलिए उम्रकैद Punishment बहुत कम मामलों में ही दी जानी चाहिए, हर मामले में नहीं. जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी और जस्टिस सलिल कुमार राय की बेंच ने माना कि सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच द्वारा तय किए गए केस लॉ से यह साफ है कि दहेज हत्या के लिए धारा 304B के तहत, रेयरेस्ट ऑफ द रेयर मामलों में उम्रकैद Punishment दी जानी चाहिए. जहाँ यह आरोप हो कि दुल्हन को बेरहमी से मारा गया था और जहाँ कोई कम करने वाले हालात न हों, तो ऐसी हालत में, रेयरेस्ट ऑफ द रेयर मामलों के तौर पर उम्रकैद Punishment दी जानी चाहिए.

बेंच ने कहा, हमारा मानना है कि Punishment क्वांटिटी प्रोपोर्शनल होना चाहिए. यह न तो बहुत हल्की होनी चाहिए और न ही बहुत ज्यादा और सख्त. Punishment सुनाते समय, कोर्ट को केस के फैक्ट्स और हालात को पूरी तरह से देखना चाहिए, जिसमें दोनों पार्टियों की सोशियो-इकोनॉमिक कंडीशन भी शामिल हैं, ताकि इंसाफ का मकसद पूरा हो और समाज को यह साफ मैसेज दिया जा सके कि कोई भी इंसान कोई भी घिनौना जुर्म करने की हिम्मत नहीं कर सकता.

हमारा मानना है कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई उम्रकैद की Punishment को घटाकर दस साल की कैद करके इंसाफ का मकसद पूरा किया जाएगा. क्योंकि, आरोपित पहले ही जेल में 10 साल से ज्यादा की सजा काट चुके हैं, इसलिए दोनों की सजा को उनके पहले से जेल में गुजारे हुए समय के बराबर कम करते हैं. आरोपितों को तत्काल रिहा किया जाय.

यह आपराधिक अपील चतुर्थ अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश (ईसी एक्ट), बिजनौर द्वारा सत्र परीक्षण संख्या 593/2015 में 29.09.2018/03.10.2018 को सुनाये गये फैसले के खिलाफ दायर की गयी थी जो केस क्राइम नंबर 272/2015 से उत्पन्न हुआ था. यह मामला बिजनौर जिले के चांदपुर थाने में दर्ज किया गया था.

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने आजीवन कारावास और 10,000/- रुपये जुर्माने की सजा (Punishment) सुनाई

विवादित आदेश द्वारा अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने आरोपी शकील अहमद और शेरबाज उर्फ शादाब को धारा 304 बी आईपीसी के तहत आजीवन कारावास और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 4 के तहत दो वर्ष के कारावास और 10,000/- रुपये के जुर्माने की सजा (Punishment) सुनाई थी.

मामले के तथ्यों के अनुसार नसीमा द्वारा थाना चांदपुर जिला बिजनौर में दर्ज कराई रिपोर्ट में गुलशाना, शकील अहमद, शहजाद, कु. रोशन और शादाब को नामजद किया गया था. जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ यह आरोप लगाया गया है कि उसकी बेटी की शादी शेरबाज उर्फ शादाब के साथ 2014 में हुई थी.

शादी के बाद ससुराल वाले उसे कम दहेज लाने के लिए ताने मारते थे और दामाद बाइक की मांग करता था. परिवार के बाकी सदस्य मायके से दो लाख रुपये और लाने की मांग कर रहे थे. 09 अप्रैल 2015 को रात शेरबाज ने विवाहिता पर केरोसिन डाल दिया. उसकी सास और ननद ने उकसाया तो देवर शहजाद और ससुर शकील ने विवाहिता को आग के हवाले कर दिया. घटना में शिकायत करने वाली की बेटी बुरी तरह जल गई. बाद में उसकी मौत हो गयी तो उसने ससुराल वालों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करायी.

आरोपी के वकील ने तर्क दिया है कि दोनों ही पार्टी समाज के कमजोर तबके से हैं. आरोपी ने मृतका या उसके परिवार वालों से दहेज की कोई मांग नहीं की थी. घटना के दिन मृतक नाजिया स्टोव पर खाना बना रही थी. खाना बनाते समय स्टोव फट गया जिससे मृतका के कपड़ों में आग लग गई. आरोपी उसे इलाज के लिए हॉस्पिटल ले गए जहां उसकी मौत हो गयी. उन्होंने तर्क दिया कि आरोपी ने न तो विवाहिता पर केरोसिन डाला था और न ही माचिस से आग लगाई थी.

आरोपी के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि गवाहों नसीमा, रेशमा और आसिफ उर्फ आरिफ  ने सरकारी वकील की कहानी का सपोर्ट नहीं किया है. इसके बाद भी ट्रायल कोर्ट ने मृतका के मरने से पहले दिए गए बयान पर भरोसा करते हुए आरोपितों को धारा 304B के तहत दोषी ठहराया और उन्हें उम्रकैद की सजा (Punishment) सुनाई.

आरोपी शकील और शेरवाज दस साल से ज्यादा समय से जेल में हैं. यह भी तर्क दिया गया कि धारा 304B के तहत उम्रकैद Punishment देना जरूरी नहीं है. कोर्ट को कम से कम सात साल की Punishment देने का ऑप्शन दिया गया है. यह भी दलील दी कि आरोपी की Punishment घटाकर उतनी ही जेल कर दिया जाए जितनी सजा वे पहले ही काट चुके हैं.

इसके उलट, राज्य के वकील ने कहा है कि आरोपी ने अपने घर में बड़ा जुर्म किया. मृतक नाजिया आरोपी शेरबाज उर्फ शादाब की पत्नी और शकील अहमद की बहू थी. शादी के दो साल के अंदर ही वह अपने ससुराल में जल गई थी. एजीए ने यह भी कहा कि आरोपी-अपील करने वालों ने न सिर्फ मृतक नाजिया से 2 लाख रुपये दहेज और एक मोटरसाइकिल की मांग की बल्कि जब नाजिया और उसके माता-पिता ने उनकी मांग पूरी नहीं की तो उन्होंने उस पर केरोसिन डालकर आग लगा दी.

यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज की गई दलील और नतीजे में कोई गड़बड़ी या सबूतों की गलत समझ नहीं है, इसलिए आरोपी-अपील करने वालों द्वारा दायर क्रिमिनल अपील में कोई दम नहीं है और इसे खारिज किया जा सकता है.

सुनवाई के दौरान कोर्ट में हेम चंद बनाम हरियाणा राज्य, (1994) 6 एससीसी 727, जो कि धारा 304 बी आईपीसी (दहेज मृत्यु) के तहत भी एक मामला था, के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की बेंच द्वारा सुनाये गये फैसले पर गौर किया. इसके पैरा 7 में बेंच ने माना कि;

IPC के सेक्शन 304-B को पढ़ने से पता चलता है कि जब यह सवाल उठता है कि क्या किसी व्यक्ति ने किसी महिला की दहेज हत्या का अपराध किया है, तो बस यह दिखाना जरूरी है कि उसकी अननैचुरल मौत से ठीक पहले, जो शादी के सात साल के अंदर हुई थी, मृतक के साथ उस व्यक्ति ने दहेज की मांग के लिए या उससे जुड़े मामले में क्रूरता या हैरेसमेंट किया था. अगर ऐसा दिखाया जाता है तो कोर्ट यह मान लेगा कि ऐसे व्यक्ति ने दहेज हत्या की है. इसी तरह एविडेंस एक्ट के सेक्शन 113-B के तहत दहेज हत्या के बारे में एक अनुमान है. असल में यही अनुमान IPC के सेक्शन 304-B में भी शामिल किया गया है.

इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आरोपी का मौत से कोई सीधा संबंध है या नहीं, उसे दहेज हत्या करने वाला माना जाएगा, बशर्ते सेक्शन में बताई गई दूसरी जरूरतें पूरी हों. इस मामले में प्रॉसिक्यूशन ने यह साबित कर दिया है कि मृतक की अननैचुरल मौत हुई थी, लेकिन आरोपी को मौत से जोड़ने वाला कोई सीधा सबूत नहीं है.

आरोपी ने सेक्शन 302 IPC के तहत चार्ज किया गया है. प्रॉसिक्यूशन ने साबित कर दिया कि यह एक अननैचुरल मौत थी, ऐसे में भी सेक्शन 304-B IPC लगेगा. लेकिन इस बात, यानी आरोपी का मौत से सीधा कनेक्शन न होना, को आरोपी को दी जाने वाली सजा (Punishment) को बैलेंस करने में जरूर ध्यान में रखना होगा.

फैक्ट्स और हालात को देखते हुए हम इस बारे में फाइंडिंग और रीजनिंग को बनाए रखते हुए सजा (Punishment) के ऑर्डर को बनाए रखने के लिए तैयार हैं. हम ट्रायल कोर्ट के फाइंडिंग को बदले बिना, Punishment उम्रकैद से घटाकर आरोपी-अपील करने वालों द्वारा पहले ही काटी गई अवधि तक करने के लिए तैयार हैं.
बेंच ने कहा

CRIMINAL APPEAL No. – 2903 of 2020; Shakeel Ahmad and another V/s State of U.P.

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