मॉब लिंचिंग के आरोपित Juvenile को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दी सशर्त जमानत, 6 महीने से Juvenile care home में है नाबालिग
Juvenile जस्टिस बोर्ड और अपील कोर्ट के आदेशों को हाई कोर्ट ने रद किया, नाबालिग की मां के लिए तय की शर्तें

इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सुभाष चन्द्र शर्मा ने मॉब लिंचिंग की घटना में शामिल होने के आरोप के चलते छह महीने से अधिक समय से Juvenile केयर होम में रखे गये नाबालिग के खिलाफ Juvenile जस्टिस बोर्ड और अपील कोर्ट के आदेश को रद करते हुए उसे रिहा करने का आदेश दिया है. तथ्यों को परखने और दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद बेंच ने माना कि डिस्ट्रिक्ट प्रोबेशन ऑफिसर की रिपोर्ट में मौजूदा अपराधी के खिलाफ कुछ भी नहीं है.
बेंच ने माना कि Juvenile जस्टिस एक्ट के सेक्शन 12 के तहत दिए गए प्रोविजन पर Juvenile जस्टिस बोर्ड और अपील कोर्ट ने विचार नहीं किया है. Juvenile जस्टिस बोर्ड ने बेल एप्लीकेशन पर फैसला करते समय फैक्ट्स पर विचार नहीं किया और अपील कोर्ट ने अपील खारिज करते समय रिकॉर्ड में मौजूद मटीरियल पर विचार नहीं किया. इसे कानूनी नहीं कहा जा सकता. कोर्ट को बताया गया कि नाबालिग अपराधी 05 जून 2025 से Juvenile केयर होम में है. इसके चलते उसकी मानसिकता पर बुरा असर पड़ रहा है.
यह क्रिमिनल रिवीजन प्रयागराज जनपद के सराय ममरेज थाना क्षेत्र में हुई घटना के आरोप में पकड़े जाने पर नाबालिग को Juvenile केयर होम में रखे जाने और जमानत अपील नामंजूर किये जाने पर दाखिल की गयी थी. रिवीजनिस्ट ने अपनी गार्जियन मां के जरिए Juvenile Justice (केयर एंड प्रोटेक्शन) एक्ट-2015 के सेक्शन 102 के तहत रिवीजन दाखिल की गयी.
इसमें जुवेनाइल अपील नंबर 136/2025 में एडिशनल सेशंस जज/स्पेशल पाक्सो-1, इलाहाबाद द्वारा 27 अक्टूबर 2025 को दिए गए फैसले और ऑर्डर के साथ-साथ Juvenile Justice Board खुल्दाबाद, प्रयागराज द्वारा 16 सितंबर 2025 को दिए गए आदेश को रद्द करने की मांग की गयी थी. इसके अलावा रिवीजनिस्ट को केस क्राइम नंबर 107/2025, सेक्शन 3(5), 103(2) के तहत बेल पर रिहा करने की भी रिक्वेस्ट की गई थी.

रिवीजनिस्ट के वकील ने कहा है कि इस केस में नाबालिग (Juvenile) बेगुनाह है और उसे झूठा फंसाया गया है. आरोपी का नाम एफआईआर में नहीं था. विवेचना के दौरान उसका नाम सामने लाया गया है. घटना के समय आरोपी की उम्र करीब 15 साल 7 महीने थी. दूसरे सह-आरोपी जो बालिग थे उन्हें इस कोर्ट की को-ऑर्डिनेट बेंच ने बेल दे दी है.
केस के फैक्ट्स और हालात के साथ रिवीजनिस्ट के वकील और एजीए की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड के अवलोकन से कोर्ट ने पाया कि इस घटना में सह-आरोपी जो बालिग थे, को पहले ही कोर्ट से बेल मिल चुकी है. बेंच ने कहा Juvenile जस्टिस एक्ट की धारा 12 के तहत जो प्रोविजन हैं और जिला प्रोबेशन अधिकारी की रिपोर्ट को देखते हुए, ऐसा लगता है कि जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड और अपील कोर्ट ने जरूरी प्रोविजन और रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों पर ठीक से विचार नहीं किया, बल्कि बिना अपनी न्यायिक समझ का इस्तेमाल किए ऑर्डर पास कर दिया.
बेंच ने माना कि रिवीजन में दम दिखता है और जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड और अपील कोर्ट के पास किए गए ऑर्डर रद्द किए जा सकते हैं. बेंच ने इसलिए, जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के 27.10.2025 के ऑर्डर और अपील कोर्ट के 16.09.2025 के ऑर्डर को रद्द करते हुए क्रिमिनल रिवीजन को मंजूरी दे दी. निर्देश दिया कि अपराधी/एप्लीकेंट को संबंधित जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड की संतुष्टि के लिए रिवीजनिस्ट (अपराधी की माँ) और उतनी ही रकम के दो श्योरिटी द्वारा पर्सनल बॉन्ड भरने पर जमानत पर रिहा किया जाए.
कोर्ट ने तय कि Juvenile के जमानत के बाद लिए शर्तें:
(i) रिविजनिस्ट/नेचुरल गार्जियन (माँ) एक अंडरटेकिंग देगी कि जमानत पर रिहा होने पर रिविजनिस्ट को किसी जाने-माने क्रिमिनल के कॉन्टैक्ट में आने या मिलने-जुलने की इजाजत नहीं देगी. उसे किसी भी मोरल, फिजिकल या साइकोलॉजिकल खतरे में नहीं डाला जाएगा और साथ ही माँ यह पक्का करेगी कि जुवेनाइल दोबारा जुर्म न करे.
(ii) रिविजनिस्ट/नेचुरल गार्जियन (माँ) आगे एक अंडरटेकिंग देगा कि जुवेनाइल अपनी पढ़ाई सही लेवल पर करेगा, जिसके लिए उसे दूसरे कंस्ट्रक्टिव कामों के अलावा बढ़ावा दिया जाएगा और उसे अपना समय बेकार और ज्यादा मनोरंजन वाली चीजों में बर्बाद नहीं करने दिया जाएगा.
(iii) जुवेनाइल और रिविजनिस्ट/नेचुरल गार्जियन (माँ) हर कैलेंडर महीने के पहले सोमवार को प्रोबेशन ऑफिसर को रिपोर्ट करेंगी.
(iv) प्रोबेशन ऑफिसर नाबालिग की एक्टिविटीज पर कड़ी नजर रखेंगे और रेगुलर उसकी सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट तैयार करेगा, जिसे संबंधित जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को समय-समय पर जमा किया जाएगा.
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