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जिसके नाम कार उसकी Insurance कंपनी क्लेम भुगतान की जिम्मेदार मृतक के स्वजनों को 17,94,718/- रुपये भुगतान का आदेश

कर्मचारी क्षतिपूर्ति आयुक्त के आदेश को हाई कोर्ट ने सही ठहराया, Insurance कंपनी की अपील खारिज

जिसके नाम कार उसकी Insurance कंपनी क्लेम भुगतान की जिम्मेदार, मृतक के स्वजनों को 17,94,718/- रुपये भुगतान का आदेश

जब गाड़ी का मालिकाना हक एक्सीडेंट (Insurance claim) से पहले ट्रांसफर हो, लेकिन न तो ट्रांसफर करने वाले ने और न ही ट्रांसफरी ने रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट में मालिक का नाम बदलने के लिए कोई कदम उठाया. इस गलती को देखते हुए ट्रांसफर करने वाले को एक्ट के मकसद के लिए गाड़ी का मालिक माना जाना चाहिए, भले ही सिविल कानून के तहत वह गाड़ी बेचने के बाद उसका मालिक नहीं रहा. इस स्थिति में ट्रांसफर करने वाले को ही Insurance क्लेम की स्थिति में मुआवजा देना होगा. इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस संदीप जैन ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये गये इस फैसले पर भरोसा करते हुए ओरियंट Insurance कंपनी की अपील खारिज कर दी.

कोर्ट ने कहा है कि Insurance कंपनी ने कमिश्नर द्वारा तय की गयी मुआवजे की रकम ब्याज के साथ रुपये 17,94,718/- जमा कर दी है तो कमिश्नर क्लेम करने वालों को इसका भुगतान सुनिश्चि​त करावें. कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम 1923 की धारा 30 के तहत तात्कालिक अपील अपराधी कार के बीमाकर्ता द्वारा कर्मचारी क्षतिपूर्ति आयुक्त/उप श्रम आयुक्त, मुरादाबाद द्वारा ईसीए केस नं. 111/2015 (रामचंद्रपाल सिंह एवं अन्य बनाम निर्दोष कुमार एवं अन्य) में पारित 03 नवंबर 2025 के निर्णय एवं अवार्ड के विरुद्ध दायर की गई थी.

जिसके तहत 26 फरवरी 2015 को हुई सड़क दुर्घटना में उपरोक्त वाहन पर चालक के रूप में कार्यरत धर्मवीर की असामयिक मृत्यु के लिए दावेदारों को 12% प्रति वर्ष की दर से ब्याज सहित 8,26,495/- रुपये का मुआवजा तय किया गया था और इसकी क्षतिपूर्ति का भुगतान अपराधी क्वालिस के बीमाकर्ता Insurance Company द्वारा करने का आदेश दिया गया है.

अपील करने वाले Insurance कंपनी के वकील ने कहा कि गाड़ी की Insurance पॉलिसी राकेश ने ली थी. बाद में उन्होंने गाड़ी निर्दोष कुमार को बेच दी गई थी. मरने वाला निर्दोष कुमार का नहीं बल्कि राकेश का एम्प्लॉई था. चूंकि राकेश ने एक्सीडेंट से पहले गाड़ी निर्दोष कुमार को बेच दी थी इसलिए मरने वाले और निर्दोष कुमार के बीच मालिक और नौकर का कोई रिश्ता नहीं था.

इसलिए कमिश्नर क्लेम करने वालों को कोई मुआवजा नहीं दे सकते थे. Insurance पॉलिसी निर्दोष कुमार के नाम पर ट्रांसफर नहीं की गई थी, इसलिए इंश्योरेंस कंपनी क्लेम करने वालों को कोई मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार नहीं थी.

Insurance कंपनी ने गाड़ी के ड्राइवर का इंश्योरेंस करने के लिए कोई प्रीमियम नहीं लिया है. फिर भी कमिश्नर ने माना कि अपील करने वाला क्लेम करने वालों को मिलने वाले मुआवजे की भरपाई करने के लिए जिम्मेदार था. इन दलीलों के साथ यह प्रार्थना की गई थी कि अपील में मृतक और अपील करने वाले के बीच मालिक और नौकर का रिश्ता न होने पर मुआवजा देने की इंश्योरेंस कंपनी की जिम्मेदारी के बारे में कानून के जरूरी सवाल शामिल हैं इसलिए इसे सुनवाई के लिए स्वीकार किया जाए. कोर्ट ने कहा कि मैंने अपील करने वाले Insurance कंपनी के वकील को सुना है और अपील के साथ जमा किए गए विवादित फैसले और डॉक्यूमेंट्स को देखा है.

सुप्रीम कोर्ट ने पुष्पा @ लीला और अन्य बनाम शकुंतला और अन्य (2011) 2 SCC 240 के मामले में यह माना है कि जब गाड़ी का मालिकाना हक एक्सीडेंट से पहले ट्रांसफर हो गया था, लेकिन न तो ट्रांसफर करने वाले ने और न ही ट्रांसफरी ने रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट में मालिक का नाम बदलने के लिए कोई कदम उठाया, इसलिए इस गलती को देखते हुए ट्रांसफर करने वाले को एक्ट के मकसद के लिए गाड़ी का मालिक माना जाना चाहिए, भले ही सिविल कानून के तहत वह गाड़ी बेचने के बाद उसका मालिक नहीं रहा. यह माना गया कि ट्रांसफर करने वाले को मुआवजा देना होगा.

कोर्ट ने फैसले में मेंशन किया कि, अपील के साथ जमा किए गए डॉक्यूमेंट्स को देखने से यह साफ है कि कार Insurance ​कंपनी से प्राइवेट कार लायबिलिटी ओनली पॉलिसी के तहत इंश्योर्ड थी. एक्सीडेंट 26 फरवरी 2015 को हुआ था. यह साफ है कि एक्सीडेंट की तारीख को गाड़ी अपीलेंट Insurance कंपनी के पास इंश्योर्ड थी.

यह भी साफ है कि इंश्योरेंस पॉलिसी राकेश ने ली थी और अपील के साथ अटैच आरसी वेरिफिकेशन रिपोर्ट के अनुसार, गाड़ी का मालिकाना हक 2016 में श्रीमती जयकारी देवी पत्नी गंगा राम को ट्रांसफर हो गया. जो अपीलेंट के वकील की इस बात को गलत साबित करता है कि गाड़ी का मालिकाना हक एक्सीडेंट से पहले ट्रांसफर हो गया था.

ऊपर दिए गए फैक्ट्स से यह साबित होता है कि एक्सीडेंट की तारीख को राकेश ऊपर दी गई गाड़ी का रजिस्टर्ड मालिक था. निर्दोष कुमार को भी कमिश्नर के सामने अपोजिट पार्टी बनाया गया था जिसने लिखित बयान में माना कि मृतक धर्मवीर ड्राइवर के तौर पर काम करता था, जिसकी नौकरी के दौरान 26.02.2015 को एक एक्सीडेंट में लगी चोटों की वजह से मौत हो गई थी.

मृतक एक प्राइवेट ड्राइवर था जिसके पास गाड़ी चलाने का वैलिड ड्राइविंग लाइसेंस था. उन्होंने यह भी माना कि कार का रजिस्टर्ड मालिक राकेश कुमार उनका रिश्तेदार था और वह राकेश कुमार का सिर्फ पावर ऑफ अटॉर्नी होल्डर था और गाड़ी का Insurance ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड से 04.12.2015 तक था.

तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने माना कि गाड़ी का मालिकाना हक कभी भी निर्दोष कुमार को ट्रांसफर नहीं हुआ. यह सच है कि पॉलिसी में यह बताया गया है कि Insurance कंपनी ने प्रीमियम लिया है लेकिन इसमें उन कर्मचारियों की संख्या नहीं बताई गई है जिनके लिए प्रीमियम लिया गया था.

चूंकि मरने वाला एक्सीडेंट के समय कार का ड्राइवर होने के नाते एक एम्प्लॉई के तौर पर भी काम कर रहा था इसलिए Insurance पॉलिसी में ड्राइवर का नाम न होने से इंश्योरेंस कंपनी को एक्ट के तहत अपनी कॉन्ट्रैक्ट की जिम्मेदारी से बचने का हक नहीं मिलता. जिस कार का एक्सीडेंट हुआ वह एक प्राइवेट गाड़ी थी जिसे चलाने के लिए सिर्फ ड्राइवर की जरूरत होती है. यह कोई कमर्शियल गाड़ी या ट्रक नहीं है जिसमें ड्राइवर के अलावा कोई कंडक्टर या खलासी काम करता हो.

Insurance  कंपनी ने दो लोगों का प्रीमियम लिया

यह भी साफ है कि IMT-29 के तहत हर एम्प्लॉई से सिर्फ 25/- प्रीमियम लिया जाता है लेकिन इस मामले में Insurance  कंपनी ने दो लोगों का प्रीमियम लिया है. जिससे यह साबित होता है कि ड्राइवर भी इस इंश्योरेंस पॉलिसी के तहत कवर था जो IRDAI के सर्कुलर से भी कन्फर्म होता है.

FIRST APPEAL FROM ORDER No. – 130 of 2026 ; The Oriental Insurance Company Limited V/s Ramchandrapal Singh And 5 Others

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