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शिक्षा मित्रों (Education friends) की सेवा आयु 62 वर्ष किए जाने की मांग में याचिका, हाई कोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब

शिक्षा मित्रों (Education friends) की सेवा आयु 62 वर्ष किए जाने की मांग में याचिका, हाई कोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब

उत्तर प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों में संविदाकर्मी के रूप में तैनात किये गये ​शिक्षा मित्रों (Education friends) को 62 वर्ष की आयु तक सेवा में रखने के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट में दाखिल याचिका कोर्ट ने राज्य सरकार को अपना पक्ष रखने के लिए चार सप्ताह का मौका दिया है. कोर्ट ने स्टेट की तरफ से काउं​टर एफीडेविट दाखिल किये जाने के बाद रिजवाइंडर एफीडेविट दाखिल करने के लिए याचिकाकर्ता को दो सप्ताह का मौका दिया है. प्रकरण में आगे की सुनवाई मार्च में होने की संभावना जताई जा रही है.

इलाहाबाद हाई कोर्ट में यह रिट याचिका ओम प्रकाश सिंह और तीन अन्य की ओर से दाखिल की गयी है. प्रकरण पर जस्टिस मंजू रानी चौहान की बेंच सुनवाई कर रही है. शिक्षा मित्रों (Education friends) की सेवा शर्तों से संबंधित इस महत्वपूर्ण रिट याचिका में याचिकाकर्ताओं द्वारा दिनांक 17-02-2023 के उस सरकारी आदेश को चुनौती दी गई है जिसके अंतर्गत शिक्षा मित्रों (Education friends) की संविदा आधारित सेवा 60 वर्ष की आयु पूर्ण होने पर स्वतः समाप्त करने का प्रावधान किया गया है.

याचिका में कहा गया कि शिक्षा मित्रों (Education friends) की नियुक्ति उन प्राथमिक विद्यालयों में की गई थी जहाँ सहायक अध्यापकों के पद रिक्त थे. उनका चयन विधिवत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किया गया था. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जब नियमित सहायक अध्यापकों की सेवानिवृत्ति आयु में समय-समय पर संशोधन किया गया है तो समान प्रकृति का कार्य करने वाले शिक्षा मित्रों (Education friends) के साथ भिन्न व्यवहार किया जाना न्यायसंगत नहीं है.

Education friends की सेवा आयु 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष निर्धारित की जाए

याचिकाकर्ताओं ने न्यायालय से अनुरोध किया था कि विवादित सरकारी आदेश के प्रभाव एवं क्रियान्वयन पर रोक लगाई जाए तथा रिट याचिका के अंतिम निस्तारण तक शिक्षा मित्रों (Education friends) को सेवा में बनाए रखा जाए. साथ ही, प्रतिवादी अधिकारियों को निर्देशित किए जाने की मांग की गई कि शिक्षा मित्रों की सेवा आयु 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष निर्धारित की जाए अन्यथा उन्हें अपूरणीय क्षति होगी.

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि संबंधित आदेश मनमाना, अवैधानिक एवं भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 16 में प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है. याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत न्यायालय की रिट अधिकारिता का प्रयोग करते हुए सर्टिओरारी एवं परमादेश जारी किए जाने की प्रार्थना की  है.

याचिकाकर्ताओं का पक्ष अधिवक्ता गजेन्द्र सिंह यादव और सर्वेश चौबे ने रखा. कोर्ट ने रिट याचिका को संज्ञान लेते हुए स्टेट के अधिवक्ता को चार सप्ताह में काउंटर एफीडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया. नियमानुसार इसके दो सप्ताह बाद याचिकाकर्ता के अधिवक्ता को काउंटर पर अपना जवाब दाखिल करना होगा. इसके बाद रिट याचिका फिर से सुनवाई के लिए कोर्ट में लिस्ट की जायेगी.

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