11 केसों की क्रिमिनल हिस्ट्री का तर्क खारिज, पुलिस पार्टी पर Firing के आरोपी को सशर्त जमानत
अपराधी की तरफ से पुलिस पर की गयीFiring में किसी पुलिसवाले को चोट नहीं आयी जबकि मुल्जिम के पैर में पुलिस की Firing में गोली लग गयी. क्रास Firing होने के बाद भी किसी पुलिसवाले को चोट न लगने का तथ्य साबित करता है कि पुलिस की तरफ से पेश की गयी कहानी पूरी तरह से असत्य है. इसी तरह पुलिस ने उसके खिलाफ 11 केस दायर कर दिये. यह सभी मामले ऐसे हैं जिसमें अभियुक्त को झूठा फंसाया गया है. इस तर्क से सहमत होते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस कृष्ण पहल ने अभियुक्त नौशाद की सशर्त जमानत मंजूर कर ली है. याची का पक्ष अधिवक्ता बीडी निषाद भूपेन्द्र ने रखा.

आवेदक ने केस क्राइम नंबर 102/2025, सेक्शन 109, 3(5), 317(5) BNS और 3/25/28 आर्म्स एक्ट के तहत, पुलिस स्टेशन मंसूरपुर, जिला मुजफ्फर नगर में ट्रायल के पेंडिंग रहने के दौरान बेल की मांग में याचिका दाखिल की थी. आवेदक के वकील ने तर्क दिया है कि आवेदक बेकसूर है और उसे इस केस में झूठा फंसाया गया है. यह पुलिस पार्टी की Firing का नो इंजरी केस है, जबकि आवेदक क्रॉस Firing में घायल हो गया है, ऐसे में यह साफ तौर पर झूठे फंसाने का केस है.
आवेदक के वकील ने यह भी तर्क दिया है कि आवेदक पर 11 केस का क्रिमिनल हिस्ट्री बताना भी पुलिस की मनगढ़ंत कहानी है. आवेदक करीब एक साल से जेल में बंद है वह ट्रायल में सहयोग करने के लिए तैयार है. यह भी कहा गया कि अगर आवेदक को बेल पर रिहा किया जाता है तो वह बेल की आजादी का गलत इस्तेमाल नहीं करेगा.
स्टेट लॉ ऑफिसर ने जमानत अर्जी का जोरदार विरोध किया कोर्ट में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रभाकर तिवारी बनाम स्टेट ऑफ यूपी व अन्य (2020) 11 SCC 648 में दिये गये फैसले का जिक्र किया गया. सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में कहा है कि किसी आरोपी के खिलाफ कई क्रिमिनल केस का पेंडिंग होना ही बेल देने से मना करने का आधार नहीं हो सकता.
केस के फैक्ट्स और हालात, पार्टियों के वकील की दलीलें, रिकॉर्ड में मौजूद सबूत और इस बात को ध्यान में रखते हुए कि यह क्रास Fyring का मामला है जिसमें पुलिस पार्टी को कोई चोट नहीं आई है बेंच ने कहा कि केस के मेरिट पर कोई राय दिए बिना, पहली नजर में बेल का मामला बनता है. बेंच ने एप्लीकेंट- नौशाद को संबंधित कोर्ट की संतुष्टि के लिए पर्सनल बॉन्ड और उतनी ही रकम के दो श्योरिटी देने पर बेल पर रिहा करने का आदेश दिया है. कोर्ट ने बेल के लिए शर्तें भी तय कर दी हैं.
Firing के आरोपी को रिलीज ऑर्डर जारी करने से पहले, श्योरिटी को वेरिफाई किया जाए.
(i) एप्लीकेंट ट्रायल के दौरान सबूतों से छेड़छाड़ नहीं करेगा.
(ii) आवेदक सरकारी गवाहों पर दबाव नहीं डालेगा/डराया-धमकाएगा नहीं.
(iii) आवेदक तय तारीख पर ट्रायल कोर्ट के सामने पेश होगा.
इन शर्तों का उल्लंघन होने पर जमानत रद की जा सकती है. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि आवेदक को जमानत देते समय की गई बातें, गवाहों की गवाही के आधार पर अपनी अलग राय बनाने में विद्वान ट्रायल जज पर किसी भी तरह से असर नहीं डालेंगी.