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सिर्फ 2 केस पर Gangster Act की कार्यवाही कानून के अनुरूप नहीं, हाई कोर्ट की प्रयागराज के आईजी को निर्देश सरकारी कामकाज में सतर्क और सावधान रहें

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 80 दिन तक महिला को न्यायिक हिरासत में रखने को बताया गलत, गैंगस्टर एक्ट की कार्रवाई को रद किया

सिर्फ 2 केस पर Gangster Act की कार्यवाही कानून के अनुरूप नहीं, हाई कोर्ट की प्रयागराज के आईजी को निर्देश सरकारी कामकाज में सतर्क और सावधान रहें

सिर्फ दो केस दर्ज होने के आधार पर महिला समेत तीन लोगों के खिलाफ Gangster Act की कार्यवाही कर दिये जाने पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस विनोद दिवाकर ने प्रयागराज के वर्तमान आईजी अजय कुमार मिश्रा को आड़े हाथों लिया है. कोर्ट ने उन्हें निर्देश दिया है कि वह सरकारी कामकाज के दौरान सतर्क और सावधान रहें.

कोर्ट ने महिला को 80 दिन तक न्यायिक हिरासत में रखे जाने पर कहा कि यह मामला न तो Gangster एंड एंटी-सोशल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट, 1986 की शर्तों को पूरा करता है और न ही गिरफ्तारी को सही ठहराने वाले पैमानों पर खरा उतरता है. कोर्ट ने स्पेशल सेशंस ट्रायल नंबर 3072/2023 (स्टेट बनाम राजेंद्र त्यागी और अन्य) की पूरी कार्यवाही को रद्द कर दिया.

तथ्यों के अनुसार सियानंद के बेटे राजेंद्र त्यागी जो नंदग्राम गाजियाबाद में रह रहे हैं और गांव काकंडा थाना मुरादनगर गाजियाबाद के स्थायी निवासी हैं. उनका बेटा दीपक त्यागी है. आरोप है कि दोनों ने मिलकर अपने आर्थिक, भौतिक और व्यक्तिगत लाभ के लिए गाजियाबाद और जालौन जिलों में प्लॉट/जमीन दिलाने के नाम पर करोड़ों रुपये की धोखाधड़ी की. इनका खौफ इतना है कि कोई इनके खिलाफ गवाही देने या शिकायत दर्ज कराने की हिम्मत नहीं रखता.

उनका खुलेआम घूमना आम जनता के हित में नहीं है. गिरोह चार्ट में दर्ज अपराध में पहले की गई असामाजिक गतिविधियों को भी शामिल किया गया है. Gangster एंड एंटी-सोशल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट, 1986 के तहत कहा गया है कि गैंग लीडर (Gangster) राजेंद्र त्यागी और उसके गैंग के सदस्यों की आपराधिक गतिविधियों को रोकने के लिए, Gangster Act 1986 के एक्ट की धारा 3(1) के तहत कार्रवाई जरूरी है.

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थाना नंदग्राम जिला गाजियाबाद में राजेंद्र त्यागी, दीपक त्यागी और ललिता त्यागी के खिलाफ Gangster Act 1986 के एक्ट की धारा 2 और 3 के तहत FIR दर्ज की गई. राजेन्द्र त्यागी को गैंग लीडर बताया गया है. दीपक त्यागी और ललिता त्यागी क्रमश: राजेन्द्र त्यागी के बेटा और बहू हैं. उन्हें भी गैंग का सदस्य बताया गया है. FIR दर्ज होने से नाराज तीनों ने कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर, 1973 की धारा 482 के तहत अर्जी दायर करके उनके खिलाफ 1986 के एक्ट के प्रावधानों को लागू करने को चुनौती दी गई है.

यह याचिका फरवरी 2025 को लिस्ट की गयी तो आवेदकों के वकील ने पुलिस की शक्तियों के कथित दुरुपयोग का खास मुद्दा उठाया. उन्होंने तर्क दिया कि आवेदकों से संबंधित गैंग चार्ट को गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर ने यूपी Gangster एंड एंटी-सोशल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) रूल्स, 2021 के नियम 5(3)(a) का उल्लंघन करते हुए मंजूरी दी थी. ऐसी मंज़ूरी देने से पहले पुलिस कमिश्नर और जिला मजिस्ट्रेट के बीच कोई संयुक्त बैठक नहीं हुई थी.

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पुलिस अधिकारियों ने कानून द्वारा तय तरीके और कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार जरूरी ‘सब्जेक्टिव सैटिस्फैक्शन’ तक पहुँचे बिना ही आवेदकों के खिलाफ Gangster Act की कार्रवाई की. तीनों को गिरफ्तार कर लिया गया. ललिता को पहले और बाकी दोनों को बाद में जमानत मिली और रिहा कर दिया गया. ललिता एक गृहिणी हैं. मुख्य मामलों में दाखिल किसी भी चार्जशीट में उन पर कोई आरोप नहीं लगाया गया है, फिर भी उन्हें रिहाई से पहले लगभग 80 दिनों तक न्यायिक हिरासत में रहना पड़ा.

तर्क दिया गया कि इस मामले से जुड़े विवाद असल में दीवानी (सिविल) प्रकृति के हैं. पिता पुत्र दोनों मुख्य मामलों की FIR के शिकायतकर्ताओं के बीच पहले से ही एक दीवानी विवाद चल रहा था. आवेदक और शिकायतकर्ता के बीच एक ‘मेमोरेंडम ऑफ अंडरटेकिंग’ भी तैयार किया गया था क्योंकि दोनों पक्षों के बीच व्यावसायिक लेन-देन था.

रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं है जो यह साबित कर सके कि आवेदक आदतन अपराधी हैं, Gangster Act 1986 के अधिनियम की धारा 2(b) और (c) की शर्तें पूरी हो सकें. न तो आवेदक कोई गिरोह चला रहे हैं और न ही वे गैंगस्टर हैं. इसलिए आवेदकों के मामले में Gangster Act 1986 के अधिनियम की धारा 2(b) और (c) की जरूरी शर्तें पूरी नहीं होती हैं.

आवेदकों के वकील और अतिरिक्त सरकारी वकील की दलीलें सुनने के बाद, इस कोर्ट ने आवेदकों के वकील द्वारा उठाए गए मुद्दों और उनसे जुड़े अन्य मुद्दों पर विस्तार से सुनवाई करना उचित समझा. इसके अनुसार, इस कोर्ट ने समय-समय पर कई आदेश जारी किए.

कमिश्नरेट वाले जिलों में नियमों के नियम 5(3)(a) के तहत Gangster गैंग चार्ट को मंजूरी देने के लिए DM का CP के साथ संयुक्त बैठक में शामिल होना जरूरी नहीं

03.03.2025 के आदेश के जरिए, इस कोर्ट ने अतिरिक्त सरकारी वकील द्वारा रिकॉर्ड पर रखे गए 19.01.2024 के नोटिफिकेशन की जाँच की. कोर्ट ने पाया कि उसमें कहीं भी यह नहीं कहा गया था कि कमिश्नरेट वाले जिलों में नियमों के नियम 5(3)(a) के तहत Gangster गैंग चार्ट को मंजूरी देने के लिए जिला मजिस्ट्रेट का पुलिस कमिश्नर के साथ संयुक्त बैठक में शामिल होना जरूरी नहीं है.

कोर्ट ने देखा कि जिन जिलों को कमिश्नरेट के तौर पर नोटिफाई नहीं किया गया है, वहाँ गैंग चार्ट को जिला मजिस्ट्रेट और सीनियर सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस की संयुक्त बैठक में मंजूरी दी जा रही है, जबकि कमिश्नरेट सिस्टम में मंजूरी सिर्फ पुलिस कमिश्नर ही दे रहे हैं. यह तरीका पहली नजर में नियमों के नियम 5(3)(a) और राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर जारी किए गए पिछले नोटिफ़िकेशन का उल्लंघन करता हुआ पाया गया.

  • कोर्ट ने अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह), लखनऊ को चार खास सवालों पर अपना व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया:
  • (i) गैर-कमिश्नरेट ज़िलों में संयुक्त बैठक में जिला मजिस्ट्रेट की भागीदारी की प्रासंगिकता और महत्व
  • (ii) कमिश्नरेट जिलों में जिला मजिस्ट्रेट की भागीदारी को हटाने का कानूनी आधार
  • (iii) क्या ऐसी छूट से 1986 के अधिनियम के उद्देश्यों को प्रभावी ढंग से हासिल किया जा सकेगा
  • (iv) क्या पुलिस कमिश्नर को अकेले या अपने मातहत अधिकारियों के साथ संयुक्त बैठक में गैंग चार्ट को मंजूरी देने का अधिकार देने वाला कोई सरकारी नोटिफिकेशन जारी किया गया है.

कोर्ट ने गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर को भी व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया, जिसमें जिला मजिस्ट्रेट के साथ संयुक्त बैठक के बिना गैंग चार्ट को मंजूरी देने का आधार, हुई संयुक्त बैठक का विवरण, मंजूरी देने वाले अधिकारी के पास मौजूद सामग्री और गैंग की कथित कमाई का हिसाब लगाने के लिए अपनाए गए तरीके की जानकारी देनी थी.

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11.03.2025 के आदेश के तहत प्रमुख सचिव (गृह) और पुलिस कमिश्नर गाजियाबाद के व्यक्तिगत हलफनामों को रिकॉर्ड पर लेने के बाद, कोर्ट ने दलीलें सुनीं और अधिसूचना और सीआरपीसी की धारा 20(2) पर सरकार के पक्ष की जांच की. कोर्ट ने कमिश्नरेट वाले इलाकों में संयुक्त बैठक से जिला मजिस्ट्रेट को बाहर रखने और गैर-कमिश्नरेट जिलों में उन्हें शामिल करना जरूरी बनाने के कारण के बारे में खास सवाल उठाए और नियमों के नियम 5(3)(a) में जिला मजिस्ट्रेट का नाम शामिल करने के आधार की भी जांच की.

प्रयागराज रेंज के आईजी अजय मिश्रा द्वारा दाखिल हलफनामे में बताया गया कि उन्होंने पहले गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर के तौर पर इस कोर्ट में 07.03.2025 को एक हलफनामा दाखिल किया था. यह हलफनामा उस गैंग चार्ट (Gangster Act) से जुड़ा है जिसे उन्होंने केस क्राइम नंबर 101/2023 (1986 के Gangster Act एक्ट की धारा 2/3 के तहत जो नंदग्राम पुलिस स्टेशन, जिला गाजियाबाद में दर्ज है) में मंजूरी दी थी. उन्होंने रिकॉर्ड पर मौजूद सभी तथ्यों और सबूतों के आधार पर स्वतंत्र रूप से विचार किया और नियमों के नियम 5 के सब-रूल 3 के अनुसार हुई संयुक्त बैठक में डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस, सिटी जोन गाजियाबाद के साथ उचित चर्चा के बाद गैंग चार्ट को मंजूरी दी.

इस एक्ट के तहत कार्रवाई शुरू करने के लिए, गाजियाबाद जिले के नंदग्राम पुलिस स्टेशन के इंचार्ज इंस्पेक्टर ने Gangster गैंग की आपराधिक गतिविधियों का ब्योरा देते हुए एक गैंग चार्ट तैयार किया. अर्जी दाखिल करने वाले राजेंद्र त्यागी, उनके बेटे दीपक त्यागी और उनकी बहू ललिता त्यागी इस Gangster गैंग के सदस्य हैं.

वे समाज-विरोधी गतिविधियों में शामिल थे. उन पर IPC 1860 के अध्याय XVII और XXII के तहत सजा-योग्य अपराधों के लिए आपराधिक मामले दर्ज किए गए थे. उन पर गैंगस्टर होने का आरोप है जो 1986 के एक्ट की धारा 2 के क्लॉज (b) में बताई गई परिभाषा के अनुसार Gangster गैंग की गतिविधियों में मदद या सहयोग करते हैं.

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गैंग चार्ट बेसिकली दो बातों पर आधारित था. पहला गाजजियाबाद में धारा 406 और 506 के तहत दर्ज मामला. दूसरा बिजनौर जिले के चांदपुर थाने में दर्ज मामला. दोनों मामलों में आरोपितों पर आरोप लगभग सेम थे. हलफनामे के अनुसार अधिकारी ने नियमों के नियम 10 के तहत जरूरी मुख्य मामलों से जुड़ी FIR और चार्ज शीट की कॉपी और गैंग चार्ट को देखा.

ट्रायल की मौजूदा स्थिति और 1986 के एक्ट की धारा 14(1) के तहत शुरू की गई कार्यवाही की भी जांच की. इसके अलावा SHO द्वारा फॉर्म नंबर 3 में तैयार की गई और डॉसियर के साथ जोड़ी गई Gangster गैंग लीडर और सदस्यों की आपराधिक गतिविधियों की सूची की भी बारीकी से जांच की गई. पैसे, चीजों और सांसारिक फायदे के लिए किए गए अपराधों की जानकारी को वेरिफाई करने के लिए केस डायरी से उनका मिलान किया गया.

ACP ने 2021 के नियमों के नियम 12(5) के तहत जरूरी एंट्री और तथ्यों की सही और भरोसेमंद होने की पुष्टि करने के बाद, Gangster गैंग चार्ट को एडिशनल डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस (क्राइम)/नोडल ऑफिसर को उनकी जांच और स्वतंत्र रूप से विचार करने के लिए भेजा. नोडल ऑफ़िसर ने स्वतंत्र रूप से विचार करने और इस बात से संतुष्ट होने के बाद अपनी मंजूरी के साथ गैंग चार्ट को आगे भेजा.

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DCP सिटी गाजियाबाद ने नोडल ऑफिसर की सिफारिश के साथ गैंग चार्ट मिलने पर अपने स्वतंत्र विवेक का इस्तेमाल करते हुए गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर को गैंग चार्ट भेजा. पुलिस कमिश्नर ने सभी तथ्यों को अच्छी तरह से देखने और कार्रवाई का आधार होने से संतुष्ट होने के बाद, नियम 16(3) (नियम, 2021) के अनुसार संबंधित DCP के साथ संयुक्त चर्चा में अपने स्वतंत्र विवेक का इस्तेमाल करते हुए Gangster गैंग चार्ट को मंजूरी दी.

कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले के गुण-दोष पर यह स्थापित हो गया है कि Gangster Act के तहत कार्यवाही दो FIR के आधार पर शुरू की गई है. दोनों FIR जमीन की खरीद से जुड़े पैसों के लेन-देन और भुगतान से संबंधित हैं और आरोपियों ने शिकायतकर्ता के पक्ष में कुछ चेक भी जारी किए थे.

पूरी चार्ज-शीट को देखने पर, आरोपी ललिता त्यागी के खिलाफ या अन्य दो आरोपियों के खिलाफ सामूहिक रूप से ऐसी कोई बात नहीं कही गई है जो Gangster Act की धारा 2 की शर्तों को पूरा करती हो. हो सकता है कि आरोपियों ने धोखाधड़ी और जालसाजी जैसे अपराध किए हों; लेकिन इसका मतलब यह नहीं है और न ही इसे ऐसा माना जा सकता है कि वे कोई संगठित गिरोह चला रहे थे.

रिकॉर्ड में मौजूद गतिविधियां और सामग्री, उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (Gangster Act), 1986 की धारा 2(b) की शर्तों को पूरा नहीं करती हैं. रिकॉर्ड में ऐसी कोई सामग्री नहीं है जो सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाड़ने या कोई अनुचित सांसारिक या आर्थिक लाभ पाने के उद्देश्य से हिंसा, डराने-धमकाने, जबरदस्ती या किसी अन्य तरीके के इस्तेमाल को साबित कर सके.
बेंच ने जजमेंट में की टिप्पणी

इस कोर्ट का मानना है कि वह किसी अधिकारी के व्यवहार और अधिकारी-सुलभ गुणों की जांच या मूल्यांकन तब तक नहीं कर सकता जब तक कि उसके सामने कोई ठोस और विश्वसनीय सामग्री न रखी जाए. इसके अलावा न्यायिक समझ और संस्थागत मर्यादा इस कोर्ट को बिना सबूत वाली बातों पर ध्यान देने या उन पर भरोसा करने से रोकती हैं. इसलिए उत्तर प्रदेश सरकार के गृह विभाग का यह काम है कि वह फील्ड पोस्टिंग के संबंध में अपने अधिकारियों की उपयुक्तता और कामकाज की प्रभावशीलता पर स्वतंत्र रूप से विचार और मूल्यांकन करे.

अधिकारी के भविष्य के करियर को ध्यान में रखते हुए और नरमी बरतते हुए कोर्ट ने प्रयागराज के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस अजय कुमार मिश्रा को निर्देश दिया कि वे अपने सरकारी कामकाज में सतर्क और सावधान रहें. उन्हें ऐसे पद की जिम्मेदारियों के अनुरूप काम करना चाहिए जिसके लिए संतुलित फैसला लेने संस्थागत संयम बरतने और कानून का सख्ती से पालन करने की जरूरत होती है.

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