उत्तर प्रदेश में प्रधानों को ग्राम पंचायतों का administrators बनाना संविधान के अनुच्छेद 243-E का उल्लंघन
राज्य सरकार की तरफ से दी गई जानकारी सिर्फ छह महीने के लिए है administrators व्यवस्था, इसके बाद करा लिए जाएंगे चुनाव, हाई कोर्ट ने 10 जुलाई तक मांगा हलफनामा

कार्यकाल समाप्त होने के बाद प्रदेश की ग्राम पंचायतों के प्रधानों को administrators के तौर पर नियुक्त कर दिये जाने का मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के सामने पीआईएल के तौर पर पहुंचने पर दो जजों की बेंच ने राज्य निर्वाचन आयोग और पिछड़ा वर्ग आयोग को 10 जुलाई तक हलफनामा दाखिल करके यह बताने को कहा है कि चुनाव की प्रक्रिया कब तक पूरी करायी जा सकती है. उन्हें यह भी बताना होगा कि ग्राम प्रधानों को administrators के तौर पर नियुक्ति सिर्फ छह महीने के लिए की गयी है. यह कार्यकाल समाप्त होने के पहले ही पंचायत चुनाव करा लिए जाएंगे.
जस्टिस अबदेश कुमार चौधरी और जस्टिस शेखर बी. सराफ की बेंच इस प्रकरण की सुनवाई कर रही है. बेंच के सामने तीन अलग अलग जनहित याचिकाएं दाखिल की गयी थीं. इसमें कहा गया था कि ग्राम प्रधानों को ग्राम पंचायतों का administrators बनाना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243-E का उल्लंघन है और सरकार के इस फैसले को निरस्त किया जाना चाहिए.
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि प्रतिवादी उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव को इस मामले में पक्षकार बनाए रखना आवश्यक नहीं है, क्योंकि पंचायती राज विभाग, उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव/प्रमुख सचिव/निदेशक पहले से ही पक्षकार हैं. तीनों याचिकाएँ समान विषय से संबंधित हैं, इसलिए इन्हें एक साथ सुनवाई हेतु कनेक्ट किया जाए. कोर्ट ने PIL संख्या 559/2026 में याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत रूप से तथा PIL संख्या 545/2026 में याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं को सुना. साथ ही राज्य सरकार एवं राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से उपस्थित अधिवक्ताओं की दलीलें भी सुनी गई.
administrators के जरिए निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों के कार्यकाल को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाया गया
याचिका में मांग की गयी है कि 25 मई 2026 के उस शासनादेश को निरस्त किया जाए जिसके द्वारा कार्यकाल समाप्त कर चुके ग्राम प्रधानों को ग्राम पंचायतों का administrators नियुक्त किया गया है. यह घोषित किया जाए कि कार्यकाल समाप्त होने के बाद निर्वाचित ग्राम प्रधानों को ” administrators” के रूप में बनाए रखना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243-E का उल्लंघन है.
यह घोषित किया जाए कि उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम की धारा 12 (3-A) की ऐसी व्याख्या नहीं की जा सकती जिससे निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों के कार्यकाल को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाया जा सके. प्रतिवादियों को कार्यकाल समाप्त होने के बाद पूर्व ग्राम प्रधानों को प्रशासनिक नियंत्रण में बनाए रखने से रोका जाए. संविधान के अनुरूप ऐसी अस्थायी/अंतरिम प्रशासनिक व्यवस्था सुनिश्चित की जाए जो पूर्व निर्वाचित पदाधिकारियों से स्वतंत्र हो .

कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से प्रतीत होता है कि ग्राम प्रधानों तथा ग्राम पंचायत सदस्यों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो चुका है. विवादित शासनादेश के माध्यम से पूर्व ग्राम प्रधानों एवं सदस्यों को administrators नियुक्त कर उनका कार्यकाल व्यवहारिक रूप से बढ़ाया गया है. याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह पूरी प्रक्रिया असंवैधानिक है तथा संविधान के अनुच्छेद 243-E का उल्लंघन करती है.
उन्होंने यह भी कहा कि Prem Lal Patel बनाम State of U.P. (2000) मामले में इस न्यायालय की खंडपीठ ने धारा 12(3-A) से संबंधित समान प्रश्न पर विचार करते हुए इसे संविधान के अनुच्छेद 243-E एवं 243-K के विपरीत माना था. राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट के Vikas Kishanrao Gawali बनाम State of Maharashtra निर्णय के अनुपालन में उत्तर प्रदेश सरकार ने ओबीसी आरक्षण से संबंधित विषयों के निर्धारण हेतु एक आयोग गठित किया है. जब तक यह प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो जाती, तब तक ग्राम प्रधान एवं ग्राम पंचायत सदस्यों के चुनाव नहीं कराए जा सकते क्योंकि आरक्षण संबंधी निर्णय चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा है.
न्यायालय ने टिप्पणी की कि यह विषय सरकार को काफी समय से ज्ञात था और सरकार को ओबीसी आयोग का गठन तथा उसकी सिफारिशों पर कार्रवाई पहले ही कर लेनी चाहिए थी. राज्य सरकार के अधिवक्ता ने यह भी कहा कि पूर्व ग्राम प्रधानों एवं सदस्यों की administrators के रूप में नियुक्ति केवल छह माह के लिए है और इसे आगे बढ़ाने का कोई प्रस्ताव नहीं है. चुनाव इस अवधि की समाप्ति से पहले करा लिए जाएंगे.
परिस्थितियों को देखते हुए न्यायालय ने राज्य निर्वाचन आयोग तथा ओबीसी आयोग को निर्देश दिया कि पंचायत चुनावों की प्रगति के संबंध में अलग-अलग शपथपत्र सहित रिपोर्ट 10 जुलाई 2026 तक प्रस्तुत करें. मामले को 10 जुलाई 2026 को पुनः सुनवाई हेतु सूचीबद्ध किया जाएगा. इसके साथ ही जनहित याचिका संख्या 545/2026 एवं रिट-C संख्या 6046/2026 को कनेक्ट कर दिया गया है.
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